श्रीरामकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द के प्रेरणादायी जीवन और विचारों से अवगत होने पर, बहुत से युवा, रामकृष्ण संघ में शामिल होने की तीव्र आकांक्षा महसूस करते हैं। Youtube पर सुने गए, वेदांत के सारगर्भित एवं सुरुचिपूर्ण व्याख्यान भी उनके अन्दर संसार त्याग की भावना उत्पन्न कर सकते हैं। सांसारिक संबंधों और वस्तुओं से मोहभंग भी कुछ युवाओं को, आश्रमों के दरवाजों पर खीँच लाती है। फिर कुछ परोपकारी युवा भी हैं, जो रामकृष्ण संघ के साधुओं द्वारा किये गए सेवा-कार्य से प्रभावित होकर, स्वयं को संघ के सेवा-कार्य के लिए समर्पित करना चाहते हैं। तात्कालिक कारण कुछ भी हो, वे रामकृष्ण संघ में शामिल होने के पूर्व कुछ विशेष पहलुओं को ध्यानपूर्वक समझना चाहते हैं। उन भविष्य के संन्यासियों को निर्णय लेने में आसानी हो, इस उद्देश्य से, इस विषय को स्पष्ट और संक्षेप में, प्रश्न और उत्तर के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।

रामकृष्ण संघ में शामिल होने से तात्पर्य है - अपने परिवार और दोस्तों को छोड़कर, सारे सांसारिक इच्छाओं को छोड़कर, सुख और चिंता को छोड़कर, मठ जीवन को अपना लेना तथा आगे से केवल रामकृष्ण संघ के मठ या आश्रम में ही रहकर, अपने जीवन को पूर्णरूपेण आध्यात्मिक लक्ष्य और निःस्वार्थ सेवा के लिए समर्पित करना होगा।

इच्छुक युवक (कृपया ध्यान दे - युवतियाँ नहीं ) जो कम से कम स्नातक हो और 18 से 28 वर्ष के उम्र के हो, वे रामकृष्ण संघ में शामिल होने के योग्य हैं। इंजीनियरिंग या मेडिकल (Engineering/Medical ) में स्नातक तथा परास्नातक किये हुए युवकों के लिए, ऊपरी आयुसीमा 30 वर्ष है तथा पश्चिम देश के निवासियों के लिए 36 वर्ष। अधिक जानकारी के लिए कृपया ( बेलूड़ मठ ) मुख्यालय को लिखें - mail @ rkmm . org

रामकृष्ण संघ केवल पुरुष संन्यासियों की संस्था है। युवतियों के लिए, श्री सारदा मठ एक सामानांतर संस्था है, वह भी हमारे आदर्श ( आत्मनो मोक्षार्थ जगद्धिताय च ) पर चलती है। इच्छुक युवतियाँ सीधे सारदा मठ के मुख्यालय से संपर्क कर सकती हैं, जो दक्षिणेश्वर, कोलकाता में स्थित है। ई-मेल पता: saradamath.office @ gmail . com

हमें क्षमा करें ! केवल अविवाहित पुरुष ही रामकृष्ण संघ में शामिल हो सकते है। एक व्यक्ति जो पहले विवाहित था, लेकिन अभी तलाकशुदा है, उसे भी शामिल होने की अनुमति नहीं है। लेकिन आप हम से एक स्वयं-सेवक या भक्त के रूप में जुड़ सकते हैं, और आपका स्वागत भी है। कृपया आप अपने आवास के निकट स्थित, हमारे शाखा-केंद्र के अध्यक्ष/सचिव से संपर्क करें। हमारे सभी शाखा-केन्द्रों का संपर्क पता बेलुड मठ की वेबसाइट belurmath.org पर उपलब्ध है।

यद्यपि शैक्षिक योग्यता आध्यात्मिक विकास की पूर्व शर्त नहीं है फिर भी वह निम्नलिखित कारणों से जरूरी है -

  1. मठ जीवन को अपनाना एक बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय है और उस निर्णय तक पहुँचने के लिए मन की उचित परिपक्वता आवश्यक है। औपचारिक शिक्षा सब कुछ के अलावा, अक्सर इस परिपक्वता के विकास में सहायक होती है।

  2. रामकृष्ण संघ के संन्यासी विद्यालय, कॅालेज, अस्पताल, और बहुत सी अन्य संस्थाओं को संचालित करते हुए लोगों की विभिन्न प्रकार से सेवा करते हैं। इसके अतिरिक्त, वे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में तथा विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देने के लिए भी आमंत्रित किये जाते हैं। एक अच्छी शैक्षिक योग्यता इन सभी को बेहतर ढंग से कार्यान्वित करने में उपयोगी है।

  3. कुछ युवा मठ जीवन को अंतिम पनाह के रूप में या हताशा में चुनते हैं, हो सकता है कि वे अपनी पढाई या परीक्षाओं से डर गए हों या शायद अपने खराब शैक्षिक परिणामों की वजह से अपने पसंद की नौकरी प्राप्त करने में असफल रहे हों या और कोई कमी हों। वैसे लोग संस्था में शामिल न होने पावें इसलिए हम अच्छे शैक्षिक परिणाम और उम्र-सीमा पर जोर देते हैं।

आपको अपनी पढ़ाई जारी रखने की तथा जिस पाठ्य-क्रम को आपने शुरू किया है, उसे गंभीरता के साथ पूरी करने की सलाह दी जाती है। आप संघ में उसके तुरंत बाद शामिल हो सकते हैं। अपने पढ़ाई को, अपने त्याग की भावना का प्रथम शिकार न बनायें।

आगन्तुकों से, सामान्यतः यह आशा की जाती है कि संघ में शामिल होने से पूर्व वे अपनी औपचारिक शिक्षा पूरी कर लें।

संघ में शामिल होने के लिए, एक अच्छा स्वास्थ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि एक संन्यासी से यह आशा की जाती है कि वह दूसरों की सेवा करे, न की दूसरों से अपनी सेवा कराये। संघ में शामिल होने की प्रक्रिया में, आगंतुकों को अपने को स्वस्थ साबित करने हेतु, गहन मेडिकल परिक्षण से होकर गुजरना पड़ता है। वे व्यक्ति जिन्हें पुरानी एवं स्थायी बीमारी है और अगर वह उन्हें शारीरिक या मानसिक रूप से दुर्बल बनाती है तो उन्हें संघ में शामिल होने की अनुमति नहीं है, अन्यथा वे मठ जीवन की कठोरता को सहन नहीं कर पाएंगे तथा संघ पर भार बन जायेंगे।

आपको तत्काल संघ में शामिल होने की आवश्यकता नहीं है। कृपया पहले आप समय लेकर, रामकृष्ण - विवेकानन्द साहित्य की कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों को पढ़िए। इस दस्तावेज के अंत में, हमारे द्वारा पुस्तकों की सूची दी गयी है, जिसे पढ़ने की सलाह दी जाती है।

हाँ, संघ में वेदांत सम्बन्धी शास्त्रों जैसे उपनिषद् और गीता के अध्ययन हेतु अवसर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। संघ में शामिल होने के तीन साल बाद, प्रत्येक आगंतुक को बेलूड़ मठ स्थित ब्रह्मचारी प्रशिक्षण केंद्र (TC) में दो साल के लिए कठिन पाठ्य-क्रम को पढ़ना पड़ता है, जहाँ पर बहुत सारे धार्मिक विषयों को पढ़ाया जाता है, जिसमें वेदांत भी शामिल है। श्रीरामकृष्ण, सारदा देवी, स्वामी विवेकानन्द तथा अन्य संन्यासी शिष्यों का जीवन और उपदेश भी वेदांत ही है। इन दिव्य विभूतियों ने वेदान्तिक सत्य का अनुभव किया है तथा उसे अपने जीवन में प्रदर्शित किया है। उनका अनुकरण करते हुए ही हमारे संघ में शास्त्रों की शिक्षा विद्वता अर्जित करने के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सत्य में दृढ विश्वास हो और अंततः उसका प्रत्यक्ष अनुभव हो, इस उद्देश्य से दी जाती है। ब्रह्मचारी प्रशिक्षण केंद्र (TC) और साथ ही साथ हमारे पूरे संघ में भी हम जीने के उस तरीके पर बल देते हैं जिससे संन्यासियों और नव-आगंतुकों का आध्यात्मिक विकास हो।

इसमें कोई बात नहीं है। रामकृष्ण संघ सभी धर्म, राष्ट्र और जाति के लोगों के लिए खुला है, शर्त यह है कि वे त्याग के पवित्र जीवन को जीने के लिए तैयार हों तथा श्रीरामकृष्ण के आदर्श को स्वीकार करें, जिसके अनुसार सभी धर्म एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं तथा मानव की सेवा, भगवान की सेवा है।

आपका स्वागत है ! यदि आप श्रीरामकृष्ण के लिए सम्मान का भाव रखते हैं तथा उनके उपदेशों की सत्यता से प्रभावित हैं, तो आप संघ में शामिल हो सकते हैं।

हाँ, यदि आप अपने सेवा के आदर्श का विस्तार करना चाहते हैं तो आप संघ में शामिल हो सकते हैं। हमारी संस्था समाज सेवा में लगी हुई कोई गैर-सरकारी संगठन (NGO) नहीं है। हमारा आदर्श, आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च (अपने स्वयं की मुक्ति और जगत का कल्याण) है, जिसे स्वयं स्वामी विवेकानन्द ने दिया था। हमारी संस्था का आधार, प्रेरक शक्ति तथा परम लक्ष्य केवल आध्यात्मिकता है। हमारे संन्यासी समाज सेवा को अपने आध्यात्मिक साधना का ही अंग मानते है। इसलिए संघ में बने रहने के लिए आध्यात्मिक दृष्टिकोण अनिवार्य है (न की सिर्फ करुणामय हृदय या देशभक्ति की भावना)

यद्यपि अपने माता - पिता की सहमति से संघ में शामिल होना अच्छा है, लेकिन आप वयस्क हैं इसलिए हम इसे जरुरी नहीं मानते। बिरले अभिभावक ही, अपने पुत्र को संन्यासी बनने के लिए उत्साहित करते हैं। अन्यथा पुत्र द्वारा संन्यासी जीवन जीने की इच्छा प्रकट करने पर ही, उन्हें अपने माता - पिता का विरोध तथा कभी - कभी तो अत्यंत क्रोध का सामना करना पड़ता है। परन्तु अगर आप निश्चिन्त हैं कि आपको संन्यासी जीवन जीने की इच्छा सांसारिक सुखों से घृणा के कारण है न कि अपनी जिम्मेदारियों से भागने के कारण, तो फिर कुछ भी आपको रोक नहीं सकता। किन्तु उसी समय यह तथ्य भी सत्य है कि कुछ वर्षों बाद अधिकांश माता - पिता अपने पुत्र के संघ में शामिल होने के निर्णय की प्रशंसा करने लग जाते हैं तथा बहुत से अभिभावक तो गर्व महसूस करते हैं। परन्तु अभिभावक द्वारा विरोध प्रकट करने तथा रोके जाने की स्थिति में, आपको यह याद रखना होगा की मठ जीवन सदियों पुरानी व्यवस्था है और शास्त्रों ने इसका समर्थन किया है। जाबालोपनिषद् कहता है कि, ‘‘यदहरेव विरजेत तदहरेव प्रवजेत” अर्थात संसार त्याग की तीव्र इच्छा जब भी हो, ठीक उसी समय संसार का त्याग करना चाहिए।

शुरुआत के वर्षों में, यदि आवश्यक हो तो नव आगंतुक को माता - पिता से बात करने तथा उनकी कुशल क्षेम जानने की अनुमति होती है। परन्तु एक संन्यासी को अपने पूर्वाश्रम (संन्यास के पहले के जीवन) की प्रत्येक आसक्ति को क्रमशः छोड़ना जरूरी होता है। यह एक रात में प्राप्त होने वाली अवस्था नहीं है, इसलिए सांसारिक संबंधों को धीरे - धीरे खत्म करके, अनासक्ति की भावना को विकसित करना होगा।

एक संन्यासी के पास कोई भी व्यक्तिगत संपत्ति होना वर्जित है। इस बात पर हिन्दू शास्त्र और कानून, दोनों ही एक मत हैं। आपके नाम पर दर्ज चल और अचल दोनों प्रकार की संपत्तियों का अपनी इच्छा के अनुरूप निपटारा तथा भुगतान, जितना जल्दी हो सके करना होगा। किसी कारणवश यदि आप यह संघ में शामिल होने के पहले नहीं कर पाते हैं तो संघ में शामिल होने के तुरंत बाद कर लें।

नहीं, हमारे संघ में सन्यासियों को तनख्वाह नहीं दी जाती, ऐसा करना मठ जीवन के सिद्धांत के खिलाफ है। मठ जीवन पैसों के लिए की जाने वाली नौकरी जैसा नहीं है। यहाँ पर आप अपनी स्वेच्छा से तथा पूर्णरूपेण, अपने शरीर और मन को एवं अपनी प्रतिभा और योग्यता को, बिना किसी भौतिक लाभ के संघ को समर्पित करते हैं।

मठ जीवन को अपनाने का मतलब है कि पहले से ही यह मान कर चलना कि हमें सब - कुछ के लिए भगवान पर पूर्णतया निर्भर रहना है। फिर भी, संघ आपका ध्यान रखेगा और किसी भी परिस्थिति में आपको सहायता प्रदान करेगा। उस दिशा में चिंता की कोई आवश्यकता नहीं है।

संघ के सदस्य सामान्यतः कुर्ता ( बिना कॉलर वाला ), धोती और उत्तरीय (कमीज के ऊपर रखा गया वस्त्र) पहनते हैं।

कम से कम नौ वर्ष। यह समय मठ जीवन की अंतिम प्रतिज्ञा को लेने से पहले स्वयं को उसके लिए तैयार करने के उद्द्देश्य से दिया जाता है। अंततः जब आप संन्यासी बन जाते हैं तब आपको एक नया नाम मिलता है, जिसके अंत में ‘आनन्द’ आता है और ‘स्वामी’ उपाधि होता है।

संघ में शामिल होने के बाद आपको अपना सम्पूर्ण जीवन, आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च अर्थात अपने स्वयं की मुक्ति और जगत की सेवा की प्राप्ति में समर्पण करना होगा। अतः अपने शेष जीवन को जप में, ध्यान में, प्रार्थना में, उपासना में, स्तोत्र पाठ में, भजन गाने में, सद्ग्रंथों के अध्ययन में तथा अन्य आध्यात्मिक साधना में लगाना होगा। इनमें जप और ध्यान का प्रत्येक दिन अभ्यास करना अत्यंत आवश्यक है। इनमें से कुछ आप को स्वयं करना होगा तथा अन्य अपने मठ के भाईयों के साथ करना होगा। इसके साथ ही उसी उत्साह और ईमानदारी के साथ निःस्वार्थ कर्म भी करना होगा तथा संघ के सेवा कार्यों में अपना योगदान देना होगा। आप चाहे जो कार्य करें, चाहे मठ के लिए करें या लोगों की सेवा के लिए, उसे उपासना की भावना से करने की आशा की जाती है ताकि आपका कर्म भी एक तरह से आध्यात्मिक साधना बन सके। इस तरह से अपने समय को व्यतीत करते हुए आपको अपने अन्दर साधू के गुणों को और विकसित करने का प्रयत्न करना होगा जैसे पवित्रता, भक्ति, अनासक्ति, सत्यता और ब्रह्मचर्य तथा भगवान की प्राप्ति।

यहाँ पर कर्म योग, भक्ति योग, राज योग और ज्ञान योग इन चारों योगों के शांतिपूर्ण समन्वय का अनुसरण किया जाता है। यह योजना व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में सहायक होती है। वास्तव में, (जो पिछले प्रश्न के उत्तर में विस्तार से बताया गया है ) उसका यदि कोई दृढ विश्वास के साथ पालन करे तथा संघ में जो जीवन जीने का ढंग है उसका अभ्यास करे तो वह चारों योगों का समन्वय प्रायः बिना किसी प्रयत्न के कर सकता है। हमारे संघ के प्रतीक-चिन्ह में हम चारों योगों के सुन्दर समन्वय को देख सकते हैं, जिसे स्वामी विवेकानन्द ने स्वयं तैयार किया था।

ब्रह्मचर्य के बारे में महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश आपको नीचे बताई गयी पुस्तकों में मिल सकेगा -

  • स्वामी श्रीकान्तानन्द द्वारा लिखित पुस्तक ‘Youth! Arise Awake and Know Your Strength’ के ‘Strength of Brahmacharya’ अध्याय में। (रामकृष्ण मठ हैदराबाद से प्रकाशित)

  • स्वामी अशोकानन्द द्वारा लिखित पुस्तक ‘साधना और सिद्धि’ के ‘ब्रह्मचर्य’ अध्याय में। (अद्वैत आश्रम से प्रकाशित)

  • स्वामी यतीश्वरानन्द की पुस्तक ‘ध्यान ओैर आध्यात्मिक जीवन’ के निम्नलिखित दो अध्यायों में- अध्याय-12 - ‘आध्यात्मिक जीवन में काम की समस्या’ तथा अध्याय-13 - ‘ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचारियों के लिए विशेष निर्देश)’(रामकृष्ण मठ नागपुर से प्रकाशित)

हाँ, वरिष्ठ संन्यासियो के पास जाने पर उनके द्वारा मठ जीवन से सम्बंधित प्रत्येक पहलू में आपको मार्गदर्शन मिलेगा। आप उचित मार्ग पर चल रहे हैं या नहीं इसके लिए वे आप पर नजर भी रख सकते हैं।

मंत्र दीक्षा एक पवित्र रस्म है जिसमें गुरु आध्यात्मिक साधक को मंत्र (भगवान का पवित्र नाम ) देते हैं। उस मंत्र को कैसे बारम्बार दुहराना है ( अर्थात जप कैसे करना है ) और ध्यान कैसे करना है, गुरु द्वारा यह भी बताया जाता है। हमारे संघ में केवल अध्यक्ष और उपाध्यक्ष स्वामीजी (और कुछ अन्य चुने हुए संन्यासी) ही मन्त्र दीक्षा देते हैं। अगर आपने किसी एक से मन्त्र दीक्षा नहीं ली है तो आपके संघ में शामिल होने के बाद इसकी व्यवस्था कर दी जायेगी।

कुछ शाखाओं को छोड़कर हमारी सभी शाखाएं यहाँ तक की अन्य देशों की शाखाएं भी नव-आगंतुकों को स्वीकार करती हैं। आप बेलूड़ मठ में भी शामिल हो सकते हैं। बेलूड़ मठ में नवागंतुकों हेतु PPTC है। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि आप किसी भी शाखा-केंद्र से जुड़िये, आपको बेलूड़ मठ स्थित TC में दो वर्ष रहने का अवसर मिलेगा।

बेलुड मठ रामकृष्ण संघ का हृदय है जहाँ पर प्रधान मठ स्थित है तथा यहाँ पर स्वामी विवेकानन्द एवं श्रीरामकृष्ण के अन्य संन्यासी शिष्यों ने निवास किया है। यहाँ हमारा मुख्यालय भी है। यहाँ के पवित्र स्मृतिओं के कारण, अपने मठ जीवन की शुरुआत बहुत से लोग यहाँ से करना चाहते हैं। उन लोगों को PPTC में 6 से 12 महीने तक रखकर विभिन्न शाखा-केन्द्रों में भेज दिया जाता है।

वे सारे आश्रम जो श्रीरामकृष्ण या स्वामी विवेकानन्द के नाम पर चलते हैं, यह जरूरी नहीं कि हमारे शाखा केंद्र हों। इसलिए कृपया आप पता लगा लें कि वह आश्रम जिसका आप संकेत कर रहे हैं वह हमारा अधिकृत शाखा केंद्र है अथवा नहीं। हमारे अधिकृत शाखा-केन्द्रों की सूची को आप हमारे वेबसाइट belurmath.org पर देख सकते हैं।

एक विशेष शाखा केंद्र में पूरा जीवन बिताने की इच्छा रखना मठ जीवन की भावना के खिलाफ है। आप उस केंद्र में शामिल हो सकते हैं और अधिक से अधिक तीन साल के लिए वहाँ रह सकते हैं। उसके बाद बेलुड मठ के वरिष्ठ संन्यासियो द्वारा लिए गए विवेकपूर्ण निर्णय के अनुसार आपको जिस शाखा - केंद्र पर भेजा जाय, वहाँ जाने के लिए आपको तैयार रहना पड़ेगा।

शायद मिल भी सकता है या नहीं भी। प्रधान कार्यालय के पदाधिकारीगण यह तय करते हैं कि विदेश में किसे भेजना है एवं वे इसका निर्णय बहुत से पहलुओं पर विचार करके ही लेते है। अपने पसंद और नापसंद को त्यागकर ही संघ में शामिल होना उत्तम है और भगवान के प्रति पूर्ण शरणागति की भावना लेकर।

हाँ, आप किसी भी समय मठ जीवन को त्याग सकते है। लोग स्वेच्छा से इस जीवन को अपनाते हैं तथा स्वेच्छा से इसे छोड़ भी सकते हैं। अगर कोई संघ छोड़ता है तो उस पर किसी प्रकार का कानूनी या वित्तीय बंधन नहीं है। संघ को छोड़ने का अर्थ यह नहीं है कि आपके आध्यात्मिक महत्वाकांक्षा का अंत हो गया। आप जहाँ भी रहें, उसे जारी रख सकते हैं।

यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर केवल आपको निर्णय लेना है। आपकी वास्तविक रूचि कहाँ है इसको समझने के लिए अपने मन का अध्ययन कीजिये। अपने मन को मजबूत और स्थिर बनाने के लिए भगवान से ईमानदारी पूर्वक प्रार्थना करिए। इस विषय में आप बुद्धिमान लोगों से मिलकर उनकी सलाह भी ले सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय आपकी अंतरात्मा से प्रेरित होना चाहिए।

जो रामकृष्ण संघ में शामिल होना चाहते हैं, उनको पढ़ने के लिए पुस्तकों की सूची का सुझाव:

  1. श्रीरामकृष्ण: 
    1. श्रीरामकृष्ण एक जीवनी – स्वामी निखिलानन्द (अद्वैत आश्रम से प्रकाशित)
      नोटः श्रीरामकृश्ण की जीवनी को पढने के लिए सबसे प्रमाणिक और विस्तृत पुस्तक श्रीरामकृष्णलीलाप्रसंग है, जो उनके संन्यासी शिष्य स्वामी सारदानन्द ने बंगाली भाषा में लिखा था तथा उसका अंग्रेजी में अनुवाद स्वामी चेतनानन्द ने Shri Ramakrishna & His Divine play नामक शीर्षक में किया है। लीलाप्रसंग (या उसका अनुवाद) 1000 पृष्ठों से ज्यादा की एक पुस्तक है, इसलिए हमने श्रीरामकृष्ण – एक जीवनी ( स्वामी निखिलानन्द ) का सुझाव दिया है। यह एक अच्छी किताब है, जो श्रीरामकृष्ण के जीवन से सम्बंधित विस्तृत जानकारी को 266 पृष्ठों में उपलब्ध कराती है। संघ में शामिल होने के बाद आगंतुक को लीलाप्रसंग की या तो मूल प्रति या अनुवाद की हुई पुस्तक को पढना चाहिए। श्रीरामकृष्णलीलाप्रसंग हिंदी भाषा में भी उपलब्ध है।
    2. श्रीरामकृष्ण वचनामृत – महेंद्र नाथ गुप्त ‘म’ (रामकृष्ण मठ नागपुर से प्रकाशित)
      नोटः यह पुस्तक श्रीरामकृष्ण कथामृत का अनुवाद है जो मूल रूप से बंगाली भाषा में लिखी गयी थी। 
  2. श्री सारदा देवी
    1. श्री माँ सारदा देवी – स्वामी गंभीरानन्द (अद्वैत आश्रम से प्रकाशित)
  3. स्वामी विवेकानन्द
    1. युगनायक विवेकानन्द – स्वामी गंभीरानन्द (3 खण्डों में) (रामकृष्ण मठ नागपुर से प्रकाशित)
      (मूलतः बंगाली भाषा में लिखी गई)
      नोटः ऊपर जिन दोनों पुस्तकों का सुझाव दिया गया है वे स्वामी विवेकानन्द की विस्तृत तथा प्रमाणिक जीवनी प्रस्तुत करती हैं तथा हमारे संघ द्वारा प्रकाशित हैं इसलिए हमारी पहली पसंद हैं। अपने देहांत से पहले श्रीरामकृष्ण ने स्वामी विवेकानन्द को अपने भविष्य के संघ के बारे में अपने विचार से अवगत कराया। अपने संन्यासी शिष्यों का नेता स्वामी विवेकानन्द को बनाते हुए उन्हें यह जिम्मेदारी दिया की वे उनके विचारों को संघ के रूप में एक मूर्तरूप प्रदान करें जिससे उनका महान आदर्श भावी पीढ़ियों तक पहुँच सके। और समय के साथ, उनके जीवन-काल के समय तथा बाद के वर्षों में, श्रीरामकृष्ण के शिष्यों को यह समझ में आ गया कि स्वामी विवेकानन्द ने किसी अन्य की अपेक्षा सबसे सही ढंग से श्रीरामकृष्ण के उपदेशों के महत्व के बारे में समझा है। इसलिए श्रीरामकृष्ण की विलक्षणता तथा संघ को समझने के लिए पहले स्वामी विवेकानन्द के जीवन और कार्यों को अच्छी तरह से पढ़ना होगा। परन्तु, अगर ऊपर बताई गयी पुस्तकें बहुत बड़ी लगें तो निम्नलिखित संक्षिप्त जीवनी से आप शुरुआत कर सकते हैं –
    2. विवेकानन्द – एक जीवनी (स्वामी निखिलानन्द) (अद्वैत आश्रम से प्रकाशित)
  4. श्रीरामकृष्ण के संन्यासी शिष्य
    1. श्रीरामकृष्ण भक्तमालिका (स्वामी गंभीरानन्द) (2 खण्डों में) (रामकृष्ण मठ नागपुर से प्रकाशि
      (मूलतः बंगाली में)
      नोटः स्वामी विवेकानन्द के अलावा श्रीरामकृष्ण के 15 और संन्यासी शिष्य थे। स्वामी विवेकानन्द के नेतृत्व में संघ के निर्माण हेतु उन्होंने भी बहुत योगदान दिया और स्वामी विवेकानन्द के देहांत के बाद तीस वर्षों से भी अधिक समय तक संघ के विकास में योगदान दिया। अतः यदि आप उनमें से कुछ के जीवन को भी पढेंगे (जैसे – स्वामी ब्रह्मानन्द, स्वामी शिवानन्द, स्वामी सारदानन्द, स्वामी अखंडानन्द, स्वामी प्रेमानन्द एवं स्वामी रामकृष्णानन्द ) तो आपको हमारे संघ जीवन की और बेहतर जानकारी हो जाएगी। इसलिए हम ऊपर बताई गयी किताबों में से किसी एक को पढ़ने का सुझाव देते हैं।
  5. आध्यात्मिक निर्देश के लिए (रामकृष्ण मठ नागपुर से प्रकाशित)
    1. ध्यान, धर्म तथा साधना – स्वामी ब्रह्मानन्द
    2. आनन्दधाम की ओर – स्वामी शिवानन्द
    3. परमार्थ प्रसंग – स्वामी विरजानन्द
  6. स्वामी विवेकानन्द के कतिपय प्रमुख व्याख्यान और पुस्तकें (सभी पुस्तकें रामकृष्ण मठ नागपुर से प्रकाशित)
    1. भारतीय व्याख्यान
    2. पत्रावली / अग्निमंत्र
    3. कर्मयोग
    4. भक्ति योग
    5. ज्ञान योग
  7. सामान्य मठ जीवन और विशेषकर रामकृष्ण संघ के मठ जीवन के बारे में जानने हेतु –
    1. The Glory of Monastic Life – Swami Bhajanananda (published by Advaita Ashrama)
    2. Monasticism – Ideal And Traditions (a Vedanta Kesari Presentation) (published by Ramakrishna Math, Chennai)

ऊपर बताई गई पुस्तकों को खरीदने हेतु कृपया, आप हमारे वेबसाइट advaitaashrama.org , istore.chennaimath.org पर आर्डर कर सकते हैं।